Monday, May 28, 2012

सी.पी.एम के नेता एम.एम. मणि जिन्होंने हजारों संघ के निर्दोष कार्यकर्ताओं की हत्याओं की बात स्वीकारी है ||

कल एक सी.पी.एम के नेता एम.एम. मणि जिन्होंने हजारों संघ के निर्दोष कार्यकर्ताओं की हत्याओं की बात स्वीकारी है || और यह नालायक मीडिया जी न्यूज पर बुलेटिन (रक्त की राजनीति) मैं की आर.एस.एस. वालों ने इनके हाथ काट डाले, उनके पाँव काट डाले इत्यादि :)
जबकि सब जानते हैं की रक्त की राजनीति संघ नहीं मार्क्सवादी/माओवादी/काग-रसियों का पसंदीदा विषय है!!
विदेशी चंदों और काग-रसियों के चंदे से चलने वाले भांडो, कितना भी ढिंढोरा पीटो.. कम्युनिष्ट नेता ने स्वयं स्वीकार किया है उसको तो बदल नहीं सकते ना झुंट के लाउडस्पीकरों |||
किन्तु जब नरेंद्र मोदी जी ने इस सी.पी.एम. के नेता और केरल मैं हुई हत्याओं की बात की जांच की मांग करी तो सभी विरोधी सक्रीय हो गए और भाण्ड मीडिया तो अगुवा है ही :)
यह सी.पी.एम के नेता एम.एम. मणि का वीडियो जो यह स्वीकार कर रहा है की संघ के निर्दोष कार्यकर्ताओं की हत्याओके पीछे उनके सी.पी.एम कार्यकर्ताओ का हाथ है!!link:http://www.youtube.com/watch?v=bhEj9lSEGlw&feature=youtube_gdata

Saturday, May 26, 2012

रचना - क्या यह लोकतंत्र है !! लेखक -जिग्नेश पंडया

रचना - क्या यह लोकतंत्र है !! BY:लेखक -जिग्नेश पंडया

आमआदमी बेहाल सरकार माला-माल है ...क्या यह लोकतंत्र है !!
अन्धोकी सरकार बनीहै अंधा उसका राजा...क्या यह लोकतंत्र है !!

आमआदमी सोच रहा है "क्या करेगे हम" ....क्या यह लोकतंत्र है !!
हमारे द्वारा बनी सरकार हमें आंखे दिखाए ...क्या यह लोकतंत्र है !!

आमआदमी परेसानहै मोघवारी,भ्रष्टाचारसे..क्या यह लोकतंत्र है !!
जबभी आई मोघवारी लायी यह यु.पी.ऐ सरकार..क्या यह लोकतंत्र है !!

आमआदमी ही क्यों वोट देते इन देशद्रोही-गद्दारों को..क्या यह लोकतंत्र है !!
अफजल-कसाब इनके जमाई नाम ना लेना उनका...क्या यह लोकतंत्र है !!

--जय हिंद,भारत माता की जय
--जिग्नेश पंडया-उप-प्रमुख,भारतीय जनता युवा मोरचो-बावला तालुका

Saturday, May 19, 2012

भ्रष्टाचार :काका हाथरस्सी का हास्य काव्य


राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा

Sunday, May 13, 2012

यमराज का इस्तीफा -अमित कुमार सिंह

एक दिन
यमदेव ने दे दिया
अपना इस्तीफा।
मच गया हाहाकार
बिगड़ गया सब
संतुलन,
करने के लिए
स्थिति का आकलन,
इन्द्र देव ने देवताओं
की आपात सभा
बुलाई
और फिर यमराज
को कॉल लगाई।

'डायल किया गया
नंबर कृपया जाँच लें'
कि आवाज तब सुनाई।

नये-नये ऑफ़र
देखकर नम्बर बदलने की
यमराज की इस आदत पर
इन्द्रदेव को खुन्दक आई,

पर मामले की नाजुकता
को देखकर,
मन की बात उन्होने
मन में ही दबाई।
किसी तरह यमराज
का नया नंबर मिला,
फिर से फोन
लगाया गया तो
'तुझसे है मेरा नाता
पुराना कोई' का
मोबाईल ने
कॉलर टयून सुनाया।

सुन-सुन कर ये
सब बोर हो गये
ऐसा लगा शायद
यमराज जी सो गये।

तहकीकात करने पर
पता लगा,
यमदेव पृथ्वीलोक
में रोमिंग पे हैं,
शायद इसलिए,
नहीं दे रहे हैं
हमारी कॉल पे ध्यान,
क्योंकि बिल भरने
में निकल जाती है
उनकी भी जान।

अन्त में किसी
तरह यमराज
हुये इन्द्र के दरबार
में पेश,
इन्द्रदेव ने तब
पूछा-यम
क्या है ये
इस्तीफे का केस?
यमराज जी तब
मुँह खोले
और बोले-

हे इंद्रदेव।
'मल्टीप्लैक्स' में
जब भी जाता हूँ,
'भैंसे' की पार्किंग
न होने की वजह से
बिन फिल्म देखे,
ही लौट के आता हूँ।
'बरिस्ता' और 'मैकडोन्लड'
वाले तो देखते ही देखते
इज्जत उतार
देते हैं और
सबके सामने ही
ढ़ाबे में जाकर
खाने-की सलाह
दे देते हैं।

मौत के अपने
काम पर जब
पृथ्वीलोक जाता हूँ
'भैंसे' पर मुझे
देखकर पृथ्वीवासी
भी हँसते हैं
और कार न होने
के ताने कसते हैं।
भैंसे पर बैठे-बैठे
झटके बड़े रहे हैं
वायुमार्ग में भी
अब ट्रैफिक बढ़ रहे हैं।
रफ्तार की इस दुनिया
का मैं भैंसे से
कैसे करूँगा पीछा।
आप कुछ समझ रहे हो
या कुछ और दूँ शिक्षा।

और तो और, देखो
रम्भा के पास है
'टोयटा'
और उर्वशी को है
आपने 'एसेन्ट' दिया,
फिर मेरे साथ
ये अन्याय क्यों किया?
हे इन्द्रदेव।
मेरे इस दु:ख को
समझो और
चार पहिए की
जगह
चार पैरों वाला
दिया है कह
कर अब मुझे न
बहलाओ,
और जल्दी से
'मर्सिडीज़' मुझे
दिलाओ।
वरना मेरा
इस्तीफा
अपने साथ
ही लेकर जाओ।
और मौत का
ये काम
अब किसी और से
करवाओ।

Wednesday, May 9, 2012

किरण बेदी भारत की पहली महिला आई.पी.स.है !

लोग कहते है किरण बेदी NGO का खाती है शायद उन लोगो को किरण बेदी का इतिहास नहीं मालुम है भारत की पहली महिला आई.पी.स.है ! अपनी इमानदारी ओर साहस की बजह से अपनी नोकरी के दोरान कितना नुक्सान उठाया था आय दिन तबादले झेले इन्होने .जब इसको सजा के तोर पर ट्राफिक इन्स्पेक्टर बना दिया गया तो इसने नो पार्किंग जोन में खड़ी.. इंदरा गांधी की गाडी को उठा कर चालान कर दिया था जबकि उस दोर में किसी की भी इन्द्रा के सामने बोलने की हिम्मत तक नहीं होती थी .तब फिर इसको सजा के तोर पर मणिपुर भेज दिया गया था उन दिनों मणिपुर के हालत कितने खराब थे ?? इसको कभी प्रमोशन नहीं मिला अपनी इमानदारी के चलते ! यदि ये भ्रष्ट होती तो आज ये भी ओर भ्रष्ट तालुआचात अफसरों की तरह मजे की जिंदगी जी रही होती उसको क्या मतलब होता भारत की जनता से !!

Monday, May 7, 2012

Today is the 151st birth anniversary of Rabindranath Tagore

रवीन्द्रनाथ टैगोर को जब नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था, तो उस समय अंग्रेजी में उनकी संक्षिप्त जीवनी लिखी गई थी जिसे कि Les Prix Nobel पुस्तक श्रंखला में प्रथम बार प्रकाशित किया गया था। अंग्रेजी में लिखा गया रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह जीवन परिचय नोबलप्राइज.ऑर्ग में उपलब्ध है (लिंक है – Rabindranath Tagore) । प्रस्तुत है उसी अंग्रेजी लेख का हिन्दी भावानुवाद http://www.nobelprize.org/nobel_prizes/literature/laureates/1913/tagore.html
रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) देबेन्द्रनाथ टैगोर के कनिष्ठ पुत्र थे, देबेन्द्रनाथ ब्रह्मसमाज, जो कि उन्नीसवीं सदी के बंगाल का एक नया धार्मिक पंथ था तथा उपनिषद में वर्णित परम वेदान्त के आधार पर हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार के उद्देश्य से बना था, के प्रमुख थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा-दीक्षा घर में ही हुई थी, यद्यपि सत्रह वर्ष की आयु में उन्हें औपचारिक शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, किन्तु उन्होंने वहाँ पर वे अपनी शिक्षा पूर्ण न कर सके। परिपक्व अवस्था प्राप्त होने पर उन्हें अपने बहु-आयामी साहित्यिक गतिविधियों के अलावा अपने पारिवारिक भू-संपदा की व्यवस्था भी करनी पड़ी जिसके कारण वे सामान्य लोगों के सम्पर्क में आए और सामाजिक सुधारों के प्रति उनकी रुचि विकसित हुई। साथ ही उन्होंने शान्तिनिकेतन में एक प्रयोगात्मक स्कूल का संचालन भी आरम्भ कर दिया जिसमें वे उपनिषदों में निहित आदर्शों की शिक्षा देने का प्रयास करते थे। समय समय पर उन्होंने गैर भावुक तथा दूरदर्शी तरीकों से भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलनों में भी भाग लिया ‌तथा आधुनिक भारत के राजनीतिक पिता गांधी उनके समर्पित मित्र थे। टैगोर को 1915 में सत्तारूढ़ ब्रिटिश सरकार ने नाइट की उपाधि प्रदान की, लेकिन कुछ ही वर्षों के भीतर उसे उन्होंनें भारत में ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक विरोध के रूप में वापस कर दिया।
जल्दी ही वे अपनी मातृभूमि बंगाल में सफल लेखक के रूप में ख्याति मिल गई। उनकी कुछ कविताओं के अनुवाद के कारण उन्होंने पश्चिम में भी अपनी पहचान बना ली। वास्तव में उनकी ख्याति ऊँचाइयों को छूने लगी और उन्हें व्याख्यान तथा मित्रता के उद्देश्य से महद्वीपों की यात्राएँ करवाने लगी। संसार के लिए वे भारत की आध्यात्मिक विरासत की आवाज बन गए, और भारत के लिए, वशेषतः बंगाल के लिए, वे एक जीती-जागती महान संस्था बन गए। यद्यपि उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई किन्तु मूलतः वे एक कवि थे।
उनके पचास बेजोड़ कविता संग्रहों में से कुछ हैं – मानसी (1890) [एक आदर्श], सोनार तारी (1894) [सुनहरी नाव], गीतांजलि (1910) [गीत प्रस्तुति], गीतिमाल्य (1914) [गानों का पुष्पहार], और बालक (1916) [क्रेन की उड़ान]। उनकी कविताओं के अंग्रेजी प्रस्तुतीकरण, जिसमें Gardener (1913), Fruit-Gathering (1916), और The Fugitive (1921) शामिल हैं, आम तौर पर मूल बंगाली प्रस्तुति के अनुरूप नहीं हैं किन्तु उनमें से अधिकतर प्रशंसित हैं।
टैगोर के प्रमुख नाटक हैं राजा (1910) [अंधेरी कोठरी का राजा], डाकघर (1912) [पोस्ट ऑफिस], अचलायतन (1912) [अचल], मुक्तधारा (1922) [झरना], और रक्तरवि (1926)। उन्होंने अनेक लघुकथाओं तथा उपन्यासों की भी रचना की है जिनमें से कुछ हैं – गोरा (1910), घरे-बारे (1916), और योगायोग (1929)। इसके अतिरिक्त उन्होंने संगीत नाटक, नृत्य नाटक, सभी प्रकार के निबंध, यात्रा डायरी, और दो आत्मकथाएँ भी लिखी हैं। टैगोर ने हमें अनेक चित्रकारी तथा पेंटिंग्स और गीत, जिनके लिए उन्होंने स्वयं सगीत रचना भी की थी, प्रदान किए हैं।
तो यह था रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह परिचय जिसे कि उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान करते समय लिखा गया था। किन्तु इसके अलावा भी उनके विषय में अनेक उल्लेखनीय बाते हैं जैसे कि -
  • उन्होंने एक हजार से भी अधिक कविताओं तथा दो हजार से भी अधिक गीतों की रचना की है!
  • वे एक संगीतकार, अभिनेता, गायक और जादूगर भी थे!
  • उनके लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगान हैं – एक भारत का और दूसरा बँगलादेश का!
  • आज भी बंगाल में उनके गीत-संगीत के बगैर कोई समारोह शुरू नहीं होता!
….आदि-आदि-इत्यादि।
वास्तव में कहा जाए तो रवीन्द्रनाथ टैगोर उन साहित्य-स्रष्टाओं में से एक हैं जिन्हें भाषा स्थान, काल की सीमाओं में बाँधा ही नहीं जा सकता। उनकी कीर्ति अक्षय है।

सच्चाई यह इंदिरा गाँधी परिवारकी:--

एक गाँव का लड़का अपने पिताजी से पूछता है की काकाजी, क्या राहुल गाँधी राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी के पोते है,???

उसके पिताजी ने जोड़ना शुरू किया तो पाया की इस गाँधी परिवार की शुरुआत कहा से हुई है, उसका दिमाग चकरा गया फिर बेटे का दिल रखने लिए उसने कह दिया, हा, राहुलजी गाँधी बाबा के परपोते है,

परन्तु उसका खुद दिल इस बोझ से दब गया की वह स्वयं अपने बेटे को बिना जानी जानकारी दे रहा है. जब बच्चा स्कूल चला गया तो वह गाव के हेडमास्टर जी के पास गया जो स्कूल जाने को तैयार थे, हेडमास्टर जी किसान का प्रश्न जानकर हैरान रह गए , सोचे थे यह हमसे पैसा माँगने आया होगा, फिर उन्होंने किसान को गाँधी परिवार की पूरी सच्चाई बताई तो किसान को अपनी अज्ञानता पर बड़ा क्रोध आया की उसे यह सब क्यों पता नहीं है,

1-राहुल का असली नाम है रौल विंसी/विन्ची ...

2-यह हिन्दू नहीं है, यह एक रोमन कथोलिक इसाई है,

3-इनकी माँ का नाम है एंटोनिया माईनो (Antonia Maino ), सोनिया गाँधी नाम बाद में भारतीयों के लिए रखा गया है, जिससे लोग जाने की यह गाँधी खानदान की है.

4-राहुल के पिता राजीव गाँधी पहले मुस्लिम थे, परन्तु एंटोनिया माईनो से शादी करने के तुरंत पहले यह इसाई बन गए.

5-राहुल जी के दादाजी का नाम था- फ़िरोज़ खान और फ़िरोज़ खान के पिताजी का नाम था नवाब खान जो एक किराना दुकान चलाते थे.

6-राहुल की दादी इंदिरा जी की शादी फ़िरोज़ खान के साथ हुई थी और शादी पहले वह मुस्लमान बन गयी थी.

7-राजीव जी के पिताजी का नाम फ़िरोज़ खान था और उनके दादाजी का नाम नवाब खान था.नवाब खान की शादी एक पारसी औरत से हुई थी जो शादी से पहले मुस्लमान बन गयी थी. राजीव गाँधी स्वयं शादी से पहले मुस्लिम से इससे बने थे.

8-इंदिरा जी ने जब फिरोज खान जी से शादी की थी तो सबको मालूम न पड़े की वह एक मुसलमान है, अपने नाम के आगे गाँधी शब्द जोड़ दिया जिससे लोग इस बारे में सोचे ही नहीं, इसी के साथ फ़िरोज़ ने भी अपने नाम के आगे गाँधी जोड़ दिया, यही से इस मुस्लिम परिवार के नाम में गाँधी लगाने लगा है. नेहरू जी तो राजीव के नाना थे जो ननिहाल की खानदान को बताता है, राजीव तक यह परिवार मुस्लिम था परन्तु एंटोनिया माईनो के बाद ये सब रोमन कैथोलिक इसाई है.

9-प्रियंका जी का असली नाम बियांका (बियंका) है और उनकी शादी एक इसाई राबर्ट बढेरा से हुई है. राबर्ट बढेरा की जाँच भारत के हवाई अड्डे पर नहीं की जाती है.

इस बात को जब किसान ने अपने बेटे को बताया बेटे ने बोला की अब मुझे आप पता करके बताइए की जवाहर लाल जी के दादा जी कौन थे इस समय नहीं फुर्सत में पता करके बताइए, मै कल पूछूँगा.
अब वह किसान किसी दिन आपको मिल जायेगा और नेहरू खानदान की जानकारी मागेगा, , इसलिए उसे बताने से पहले स्वयं सच्चाई जानिए और पता लग जाये तो मुझे भी मेल कर देना, किसान मुझसे भी तो मिल सकता है....... जरुर मेल करियेगा ....

Sunday, May 6, 2012

यह पढ़ाया जा रहा है आपके बच्चों को.....जरूर पढ़ें और शेयर करें !

*** यह पढ़ाया जा रहा है आपके बच्चों को.....जरूर पढ़ें और शेयर करें !

* वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गौमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

* महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

* 1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

* महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

* तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

* जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 - आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

* रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

* आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

* तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

* 400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

* वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।
(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)

* औरंगजेब जिन्दा पीर थे।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)

* राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

आज ये शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से मैकाले के सिद्धांत पर चल रही है, हमे हमारे संस्कृति से और दूर ले जा रही है। आप आज जो ये नस्ल, अंग्रेजो की गुलामी वाली मानसिकता, इनके उत्सवो को जोर -सर से मनाने पीढिया और अपने संस्कृति का बिलकुल भी ध्यान ना रखने वाले ये जो लोग भी है, ये समझते है की वो बहुत ही ज्ञानी, विद्वान और आधुनिक लोग है।

आज आप इन्हें इनके विचार और ब्रितानी स्टाईल पर प्रश्न चिन्ह लगाओगे तो ये आग-बबोला हो उठेंगे और आप को अनपढ़ और गवार और Show-Off करने वाला भी कह सकते है।

घोर आश्चर्य है कि भारत में मैकाले अभी तक जिन्दा है......!!

आनॆ वाली "शांन्घाइ" फ़िल्म मे एक गाना मेने कल देखा उसमे इमरान हासमि जिनको हम हिरो कहेते है!!वह इतनि बुरि(टपोरिक़ि)तरहसे डान्स कर रहा था!!ओर वह जिस गाने पर डान्स कर रहाथा वह हमारि "भारत माताके नामसे" जुडा है,वह गाना यह है फिल्म"शांन्घाइ"गाना:भारत माताकि...भारत माताकि...., सोने कि चिडिया...डेन्गु-मलेरिया...,गोबरभि... आगे कई गलत शब्दोका उपयोग किया है वह मे यहा नहि रखना चाहता!!! कयु हमहि अपनि देशकि संस्क्रुतिका ओर अपने देशका अपमान सहन करते है,यह सेन्सर बोड क्या कर रहा है.उसमे बेढे लोग कया अमेरिकनोकि ओलादे है!!!दोस्तो इतना विरोध करोकि यह गाने पर केन्द्र सरकार बेन लगाने पर मजबुर हो जाये..:Bharat mata ki jai - Shanghai Full video song HD

Saturday, May 5, 2012

DO YOU KNOW????BY:MEDIA NEWS

देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से छुपा लिया. या शायद सीबीआई ने भारत सरकार को इस घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं. देश अंधेरे में और देश को तबाह करने वाले रोशनी में हैं. आइए, आपको
आज़ाद भारत के सबसे बड़े आपराधिक षड्‌यंत्र के बारे में बताते हैं, जिसे हमने पांच महीने की तलाश के बाद आपके सामने रखने का फ़ैसला किया है. कहानी है रिज़र्व बैंक के माध्यम से देश के अपराधियों द्वारा नक़ली नोटों का कारोबार करने की.
नक़ली नोटों के कारोबार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपने जाल में जकड़ लिया है. आम जनता के हाथों में नक़ली नोट हैं, पर उसे ख़बर तक नहीं है. बैंक में नक़ली नोट मिल रहे हैं, एटीएम नक़ली नोट उगल रहे हैं. असली-नक़ली नोट पहचानने वाली मशीन नक़ली नोट को असली बता रही है. इस देश में क्या हो रहा है, यह समझ के बाहर है. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से यह पता चला है कि जो कंपनी भारत के लिए करेंसी छापती रही, वही 500 और 1000 के नक़ली नोट भी छाप रही है. हमारी तहक़ीक़ात से यह अंदेशा होता है कि देश की सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जाने-अनजाने में नोट छापने वाली विदेशी कंपनी के पार्टनर बन चुके हैं. अब सवाल यही है कि इस ख़तरनाक साज़िश पर देश की सरकार और एजेंसियां क्यों चुप हैं?

एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई, अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है?

अब सवाल यह है कि सीबीआई को मुंबई के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में छापा मारने की ज़रूरत क्यों पड़ी? रिजर्व बैंक से पहले नेपाल बॉर्डर से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के क़रीब 70-80 बैंकों में छापा पड़ा. इन बैंकों में इसलिए छापा पड़ा, क्योंकि जांच एजेंसियों को ख़बर मिली है कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में नक़ली नोट भेज रही है. बॉर्डर के इलाक़े के बैंकों में नक़ली नोटों का लेन-देन हो रहा है. आईएसआई के रैकेट के ज़रिए 500 रुपये के नोट 250 रुपये में बेचे जा रहे हैं. छापे के दौरान इन बैंकों में असली नोट भी मिले और नक़ली नोट भी. जांच एजेंसियों को लगा कि नक़ली नोट नेपाल के ज़रिए बैंक तक पहुंचे हैं, लेकिन जब पूछताछ हुई तो सीबीआई के होश उड़ गए. कुछ बैंक अधिकारियों की पकड़-धकड़ हुई. ये बैंक अधिकारी रोने लगे, अपने बच्चों की कसमें खाने लगे. उन लोगों ने बताया कि उन्हें नक़ली नोटों के बारे में कोई जानकारी नहीं, क्योंकि ये नोट रिजर्व बैंक से आए हैं. यह किसी एक बैंक की कहानी होती तो इसे नकारा भी जा सकता था, लेकिन हर जगह यही पैटर्न मिला. यहां से मिली जानकारी के बाद ही सीबीआई ने फ़ैसला लिया कि अगर नक़ली नोट रिजर्व बैंक से आ रहे हैं तो वहीं जाकर देखा जाए कि मामला क्या है. सीबीआई ऱिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पहुंची, यहां उसे नक़ली नोट मिले. हैरानी की बात यह है कि रिज़र्व बैंक में मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिन्हें आईएसआई नेपाल के ज़रिए भारत भेजती है.

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में नक़ली नोट कहां से आए, इस गुत्थी को समझने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में नक़ली नोटों के मामले को समझना ज़रूरी है. दरअसल हुआ यह कि आईएसआई की गतिविधियों की वजह से यहां आएदिन नक़ली नोट पकड़े जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है. बहुत सारे केसों में वकीलों ने अनजाने में जज के सामने यह दलील दी कि पहले यह तो तय हो जाए कि ये नोट नक़ली हैं. इन वकीलों को शायद जाली नोट के कारोबार के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था, स़िर्फ कोर्ट से व़क्त लेने के लिए उन्होंने यह दलील दी थी. कोर्ट ने जब्त हुए नोटों को जांच के लिए सरकारी लैब भेज दिया, ताकि यह तय हो सके कि ज़ब्त किए गए नोट नक़ली हैं. रिपोर्ट आती है कि नोट असली हैं. मतलब यह कि असली और नक़ली नोटों के कागज, इंक, छपाई और सुरक्षा चिन्ह सब एक जैसे हैं. जांच एजेंसियों के होश उड़ गए कि अगर ये नोट असली हैं तो फिर 500 का नोट 250 में क्यों बिक रहा है. उन्हें तसल्ली नहीं हुई. फिर इन्हीं नोटों को टोक्यो और हांगकांग की लैब में भेजा गया. वहां से भी रिपोर्ट आई कि ये नोट असली हैं. फिर इन्हें अमेरिका भेजा गया. नक़ली नोट कितने असली हैं, इसका पता तब चला, जब अमेरिका की एक लैब ने यह कहा कि ये नोट नक़ली हैं. लैब ने यह भी कहा कि दोनों में इतनी समानताएं हैं कि जिन्हें पकड़ना मुश्किल है और जो विषमताएं हैं, वे भी जानबूझ कर डाली गई हैं और नोट बनाने वाली कोई बेहतरीन कंपनी ही ऐसे नोट बना सकती है. अमेरिका की लैब ने जांच एजेंसियों को पूरा प्रूव दे दिया और तरीक़ा बताया कि कैसे नक़ली नोटों को पहचाना जा सकता है. इस लैब ने बताया कि इन नक़ली नोटों में एक छोटी सी जगह है, जहां छेड़छाड़ हुई है. इसके बाद ही नेपाल बॉर्डर से सटे बैंकों में छापेमारी का सिलसिला शुरू हुआ. नक़ली नोटों की पहचान हो गई, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि नेपाल से आने वाले 500 एवं 1000 के नोट और रिज़र्व बैंक में मिलने वाले नक़ली नोट एक ही तरह के कैसे हैं. जिस नक़ली नोट को आईएसआई भेज रही है, वही नोट रिजर्व बैंक में कैसे आया. दोनों जगह पकड़े गए नक़ली नोटों के काग़ज़, इंक और छपाई एक जैसी क्यों है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत के 500 और 1000 के जो नोट हैं, उनकी क्वालिटी ऐसी है, जिसे आसानी से नहीं बनाया जा सकता है और पाकिस्तान के पास वह टेक्नोलॉजी है ही नहीं. इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जहां से ये नक़ली नोट आईएसआई को मिल रहे हैं, वहीं से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को भी सप्लाई हो रहे हैं. अब दो ही बातें हो सकती हैं. यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से नक़ली नोट आया या फिर हमारी अर्थव्यवस्था ही अंतरराष्ट्रीय मा़फ़िया गैंग की साज़िश का शिकार हो गई है. अब सवाल उठता है कि ये नक़ली नोट छापता कौन है.

हमारी तहक़ीक़ात डे ला रू नाम की कंपनी तक पहुंच गई. जो जानकारी हासिल हुई, उससे यह साबित होता है कि नक़ली नोटों के कारोबार की जड़ में यही कंपनी है. डे ला रू कंपनी का सबसे बड़ा करार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ था, जिसे यह स्पेशल वॉटरमार्क वाला बैंक नोट पेपर सप्लाई करती रही है. पिछले कुछ समय से इस कंपनी में भूचाल आया हुआ है. जब रिजर्व बैंक में छापा पड़ा तो डे ला रू के शेयर लुढ़क गए. यूरोप में ख़राब करेंसी नोटों की सप्लाई का मामला छा गया. इस कंपनी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को कुछ ऐसे नोट दे दिए, जो असली नहीं थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की टीम इंग्लैंड गई, उसने डे ला रू कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने हम्प्शायर की अपनी यूनिट में उत्पादन और आगे की शिपमेंट बंद कर दी. डे ला रू कंपनी के अधिकारियों ने भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह कहा कि कंपनी से जुड़ी कई गंभीर चिंताएं हैं. अंग्रेजी में कहें तो सीरियस कंसर्नस. टीम वापस भारत आ गई.

डे ला रू कंपनी की 25 फीसदी कमाई भारत से होती है. इस ख़बर के आते ही डे ला रू कंपनी के शेयर धराशायी हो गए. यूरोप में हंगामा मच गया, लेकिन हिंदुस्तान में न वित्त मंत्री ने कुछ कहा, न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई बयान दिया. रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधियों ने जो चिंताएं बताईं, वे चिंताएं कैसी हैं. इन चिंताओं की गंभीरता कितनी है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ डील बचाने के लिए कंपनी ने माना कि भारत के रिज़र्व बैंक को दिए जा रहे करेंसी पेपर के उत्पादन में जो ग़लतियां हुईं, वे गंभीर हैं. बाद में कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव जेम्स हसी को 13 अगस्त, 2010 को इस्ती़फा देना पड़ा. ये ग़लतियां क्या हैं, सरकार चुप क्यों है, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया क्यों ख़ामोश है. मज़ेदार बात यह है कि कंपनी के अंदर इस बात को लेकर जांच चल रही थी और एक हमारी संसद है, जिसे कुछ पता नहीं है.

5 जनवरी, 2011 को यह ख़बर आई कि भारत सरकार ने डे ला रू के साथ अपने संबंध ख़त्म कर लिए. पता यह चला कि 16,000 टन करेंसी पेपर के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू की चार प्रतियोगी कंपनियों को ठेका दे दिया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू को इस टेंडर में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी नहीं किया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने इतना बड़ा फै़सला क्यों लिया. इस फै़सले के पीछे तर्क क्या है. सरकार ने संसद को भरोसे में क्यों नहीं लिया. 28 जनवरी को डे ला रू कंपनी के टिम कोबोल्ड ने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि डे ला रू का अब आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ कोई समझौता होगा या नहीं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी डे ला रू से कौन बात कर रहा है और क्यों बात कर रहा है. मज़ेदार बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ख़ामोश रहा.

इस तहक़ीक़ात के दौरान एक सनसनीखेज सच सामने आया. डे ला रू कैश सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 2005 में सरकार ने दफ्तर खोलने की अनुमति दी. यह कंपनी करेंसी पेपर के अलावा पासपोर्ट, हाई सिक्योरिटी पेपर, सिक्योरिटी प्रिंट, होलोग्राम और कैश प्रोसेसिंग सोल्यूशन में डील करती है. यह भारत में असली और नक़ली नोटों की पहचान करने वाली मशीन भी बेचती है. मतलब यह है कि यही कंपनी नक़ली नोट भारत भेजती है और यही कंपनी नक़ली नोटों की जांच करने वाली मशीन भी लगाती है. शायद यही वजह है कि देश में नक़ली नोट भी मशीन में असली नज़र आते हैं. इस मशीन के सॉफ्टवेयर की अभी तक जांच नहीं की गई है, किसके इशारे पर और क्यों? जांच एजेंसियों को अविलंब ऐसी मशीनों को जब्त करना चाहिए, जो नक़ली नोटों को असली बताती हैं. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि डे ला रू कंपनी के रिश्ते किन-किन आर्थिक संस्थानों से हैं. नोटों की जांच करने वाली मशीन की सप्लाई कहां-कहां हुई है.

हमारी जांच टीम को एक सूत्र ने बताया कि डे ला रू कंपनी का मालिक इटालियन मा़िफया के साथ मिलकर भारत के नक़ली नोटों का रैकेट चला रहा है. पाकिस्तान में आईएसआई या आतंकवादियों के पास जो नक़ली नोट आते हैं, वे सीधे यूरोप से आते हैं. भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और देश की जांच एजेंसियां अब तक नक़ली नोटों पर नकेल इसलिए नहीं कस पाई हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब तक इस मामले में पाकिस्तान, हांगकांग, नेपाल और मलेशिया से आगे नहीं देख पा रही हैं. जो कुछ यूरोप में हो रहा है, उस पर हिंदुस्तान की सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है.

अब सवाल उठता है कि जब देश की सबसे अहम एजेंसी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब सरकार ने क्या किया. जब डे ला रू ने नक़ली नोट सप्लाई किए तो संसद को क्यों नहीं बताया गया. डे ला रू के साथ जब क़रार ़खत्म कर चार नई कंपनियों के साथ क़रार हुए तो विपक्ष को क्यों पता नहीं चला. क्या संसद में उन्हीं मामलों पर चर्चा होगी, जिनकी रिपोर्ट मीडिया में आती है. अगर जांच एजेंसियां ही कह रही हैं कि नक़ली नोट का काग़ज़ असली नोट के जैसा है तो फिर सप्लाई करने वाली कंपनी डे ला रू पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. सरकार को किसके आदेश का इंतजार है. समझने वाली बात यह है कि एक हज़ार नोटों में से दस नोट अगर जाली हैं तो यह स्थिति देश की वित्तीय व्यवस्था को तबाह कर सकती है. हमारे देश में एक हज़ार नोटों में से कितने नोट जाली हैं, यह पता कर पाना भी मुश्किल है, क्योंकि जाली नोट अब हमारे बैंकों और एटीएम मशीनों से निकल रहे हैं.
डे ला रू का नेपाल और आई एस आई कनेक्शन

कंधार हाईजैक की कहानी बहुत पुरानी हो गई है, लेकिन इस अध्याय का एक ऐसा पहलू है, जो अब तक दुनिया की नज़र से छुपा हुआ है. इस खउ-814 में एक ऐसा शख्स बैठा था, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे. इस आदमी को दुनिया भर में करेंसी किंग के नाम से जाना जाता है. इसका असली नाम है रोबेर्टो ग्योरी. यह इस जहाज में दो महिलाओं के साथ स़फर कर रहा था. दोनों महिलाएं स्विट्जरलैंड की नागरिक थीं. रोबेर्टो़ खुद दो देशों की नागरिकता रखता है, जिसमें पहला है इटली और दूसरा स्विट्जरलैंड. रोबेर्टो को करेंसी किंग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह डे ला रू नाम की कंपनी का मालिक है. रोबेर्टो ग्योरी को अपने पिता से यह कंपनी मिली. दुनिया की करेंसी छापने का 90 फी़सदी बिजनेस इस कंपनी के पास है. यह कंपनी दुनिया के कई देशों कें नोट छापती है. यही कंपनी पाकिस्तान की आईएसआई के लिए भी काम करती है. जैसे ही यह जहाज हाईजैक हुआ, स्विट्जरलैंड ने एक विशिष्ट दल को हाईजैकर्स से बातचीत करने कंधार भेजा. साथ ही उसने भारत सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह किसी भी क़ीमत पर करेंसी किंग रोबेर्टो ग्योरी और उनके मित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. ग्योरी बिजनेस क्लास में स़फर कर रहा था. आतंकियों ने उसे प्लेन के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. लोग परेशान हो रहे थे, लेकिन ग्योरी आराम से अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. उसके पास सैटेलाइट पेन ड्राइव और फोन थे.यह आदमी कंधार के हाईजैक जहाज में क्या कर रहा था, यह बात किसी की समझ में नहीं आई है. नेपाल में ऐसी क्या बात है, जिससे स्विट्जरलैंड के सबसे अमीर व्यक्ति और दुनिया भर के नोटों को छापने वाली कंपनी के मालिक को वहां आना पड़ा. क्या वह नेपाल जाने से पहले भारत आया था. ये स़िर्फ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार के पास होना चाहिए. संसद के सदस्यों को पता होना चाहिए, इसकी जांच होनी चाहिए थी. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी. शायद हिंदुस्तान में फैले जाली नोटों का भेद खुल जाता.
नकली नोंटों का मायाजाल

सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2009 के बीच 7.34 लाख सौ रुपये के नोट, 5.76 लाख पांच सौ रुपये के नोट और 1.09 लाख एक हज़ार रुपये के नोट बरामद किए गए. नायक कमेटी के मुताबिक़, देश में लगभग 1,69,000 करोड़ जाली नोट बाज़ार में हैं. नक़ली नोटों का कारोबार कितना ख़तरनाक रूप ले चुका है, यह जानने के लिए पिछले कुछ सालों में हुईं कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बारे में जानते हैं. इन बैठकों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की एजेंसियां सब कुछ जानते हुए भी बेबस और लाचार हैं. इस धंधे की जड़ में क्या है, यह हमारे ख़ुफिया विभाग को पता है. नक़ली नोटों के लिए बनी ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत नक़ली नोट प्रिंट करने वालों के स्रोत तक नहीं पहुंच सका है. नोट छापने वाले प्रेस विदेशों में लगे हैं. इसलिए इस मुहिम में विदेश मंत्रालय की मदद लेनी होगी, ताकि उन देशों पर दबाव डाला जा सके. 13 अगस्त, 2009 को सीबीआई ने एक बयान दिया कि नक़ली नोट छापने वालों के पास भारतीय नोट बनाने वाला गुप्त सांचा है, नोट बनाने वाली स्पेशल इंक और पेपर की पूरी जानकारी है. इसी वजह से देश में असली दिखने वाले नक़ली नोट भेजे जा रहे हैं. सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा कि नक़ली नोटों के मामलों की तहक़ीक़ात के लिए देश की कई एजेंसियों के सहयोग से एक स्पेशल टीम बनाई गई है. 13 सितंबर, 2009 को नॉर्थ ब्लॉक में स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेड क्वार्टर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें इकोनोमिक इंटेलिजेंस की सारी अहम एजेंसियों ने हिस्सा लिया. इसमें डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और सेंट्रल इकोनोमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि जाली नोटों का कारोबार अब अपराध से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है. इससे पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी, जिसमें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, आईबी, डीआरआई, ईडी, सीबीआई, सीईआईबी, कस्टम और अर्धसैनिक बलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस बैठक में यह तय हुआ कि ब्रिटेन के साथ यूरोप के दूसरे देशों से इस मामले में बातचीत होगी, जहां से नोट बनाने वाले पेपर और इंक की सप्लाई होती है. तो अब सवाल उठता है कि इतने दिनों बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, जांच एजेंसियों को किसके आदेश का इंतजार है?

Wednesday, May 2, 2012

|| दिखादे ‘श्याम’ वो रौनक जो वृन्दावन में होती थी ||

दिखादे ‘श्याम’ वो रौनक जो वृन्दावन में होती थी |
यमुना किनारे अठखेली जो सखियों के संग होती थी ||

निशाना पक्का था तेरा सखियों की मटकियो पर |
इल्जाम फिर भी होता था प्रभु उन्ही सखियों पर ||
तुझे नादान कह कर उन्ही की खिचाई खूब होती थी |
दिखादे ‘श्याम’ वो रौनक जो वृन्दावन में होती थी ||

कभी कपडे चुराते थे तो कभी मक्खन चुराते थे |
कभी मुहँ खोलकर वो ब्रह्माण्ड के दर्शन करवाते थे ||
देख करतब सब ओर तेरी जय जयकार होती थी |
दिखादे ‘श्याम’ वो रौनक जो वृन्दावन में होती थी ||

दलन दुष्टों का बचपन से ही खासा शौक था तेरा |
तुम्हारे नाम लेने से ही दूर हो जाता था अँधेरा ||
गुजर भक्तो की मुरली की सुरीली धुन पर होती थी |
दिखादे ‘श्याम’ वो रौनक जो वृन्दावन में होती थी ||
............श्याम

Tuesday, May 1, 2012

"बाल मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?-प्रकाश 'पंकज'

"बाल-मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?

गजब के घटिया कानून है देश के:

एक समृद्ध परिवार का बच्चा जिसकी परवरिश बड़े अच्छे ढंग से हो रही है, अपने स्कूल और पढाई छोड़ कर टी.वी. सीरियल या फिल्म में काम करता है सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की तथाकथित ख्याति के लिए तो यह "बाल-मजदूरी" नहीं होती।

वहीँ अगर कोई बच्चा अपने और अपने परिवार वालों का पेट पालने के लिए प्लेट धो लेता है तो यह "बाल-मजदूरी" हो जाती है और वहीँ यह दोगली. हमारे यहाँ ऐसे लोगों की भी कमी बिल्कुल नहीं है  जो कहेंगे कि वे टी.वी. शो वाले प्रतिभा को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसे लोगों को मेरा एक ही जबाब है अगर आपके बच्चों का टी.वी. शो में नाचना गाना प्रतिभा हो सकती है तो हरेक शाम अपनी और अपने घरवालों की रोटी जुगारने की कोशिश में उन बच्चों की प्रतिभा कहीं से भी कम नहीं है, बल्कि ज्यादा ही है। और,  अगर आप उनके सामाजिक विकास और शैक्षणिक विकास की बात करें तो दोनों जगहों पर एक हीं बात सामने आती है कि वे सभी अनिवार्य शिक्षा से दूर हो रहे हैं। जुलाहे का बच्चा तो सुविधा नहीं मिलने के कारण शिक्षा में पिछड़ रहा है पर आपका बच्चा तो सुविधाओं के बावजूद उस धारा में बह रहा है जो शैक्षणिक विकास से बिलकुल अलग है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ी एक "कबाड़ पीढ़ी" पैदा होगी।

यहाँ मै कानून को लाचार ही नहीं उन लोगों का नौकर भी समझूंगा जिनके पास पैसा है, शक्ति है, वर्चस्व है। यही लोग कानून को कुछ इस तरह से बनाते है कि जिनके पास ऐसी समृद्धि है वो इससे निकल सकते हैं और जिनके पास नहीं है वो पिसे जाते हैं इन कानूनी दैत्य-दन्तों द्वारा।

अगर कोई होटल-ढाबे वाला किसी को जीविका देने के लिए "बाल-मजदूरी" करवाने का दोषी हो सकता है तो आज हम सारे लोग जो बड़े मजे से टी.वी. के सामने ठहाके मारते हैं, वाह-वाह करते है, मेरी नज़र में वो सब दोषी हैं "बाल-मजदूरी" करवाने के।
... कानून माने या न माने।
... आप माने या न मानें।
... और मुझे यह भी मालूम है कि अकेले सिर्फ मेरे मानने से भी कुछ नहीं होने को है।

और अंत में इतना हीं कहूँगा कि यदि आपमें अब भी समाज के प्रति थोड़ी नैतिक जिम्मेदारी बची हो तो इसपर विचारें और ऐसे टी.वी. सीरियलों, फिल्मों का "प्रतिकार" करें, सामाजिक बहिष्कार करें, उनका सहभागी न बनें,
चलता हूँ और आपके लिए कुछ लिंक छोड़ जाता हूँ। धन्यवाद!
http://www.radiosargam.com/films/archives/50457/tv-channels-in-trouble-over-child-labour.html
मीडिया उस बात को उछाल-उछाल कर कान पका देती है।