Wednesday, February 29, 2012

Minakshi Pant:रंगों कि फुहार है


रंगों कि फुहार है
बसंती रुत कि बहार है |
कोयल भी देखो गा रही
रह - रहकर राग मल्हार है |
दिशाओं से गूंज रहा
ता - ता थैया का ताल है |
हर आलम जो है थिरक रहा
प्रभु कि लीलाओं का चमत्कार है |
हिरणों कि मदमस्त छलांग में
कस्तूरी पाने कि आस है |
सूरज कि निश्छल किरणों में ,
एक अपनेपन का अहसास है |
झरनों कि कलकल धारा में
समर्पण करने कि प्यास है |
पर्वत कि ऊँची चोटियों में
सुरक्षा का एक आभास है |
ये जो सतरंगी रंगों कि
छा रही छटा मनुहार है |
ये मेरे देश में लोगो का
आपस में प्यार - सम्मान है

Tuesday, February 28, 2012

सूर्यकिरण चिकित्सा


वेदों में सूर्यकिरण चिकित्सा का विवरण बड़े विस्तार से आता है। मत्स्यपुराण कहता हैं कि नीरोगिता की इच्छा हैं तो सूर्य की शरण में जाओ। वेदों में उदित होते सूर्य की किरणों का बड़ा महत्व बताया गया है। अथर्ववेद 17/1/30 में वर्णन आया हैं कि उदित होता सूर्य मृत्यु के सभी कारणों, सभी रोगों को नष्ट कर देता है। इस समय की इन्फ्रारेड किरणों में प्रचुर जीवनीशक्ति होती है। ऋग्वेद 1/50/11 में उल्लेख हैं कि रक्ताल्पता की सर्वश्रेष्ठ औषधि हैं उदित होते सूर्य के दर्शन, ध्यान। हृदय की सभी बीमारियाँ नित्य उगते सूर्य के दर्शन, ध्यान एवं अर्घ से दूर हो सकती है। (अथर्व.1/22/1)

Monday, February 27, 2012

घर पे तिरंगा फहराया


मन चंचल काबू से बाहर
मन को कैसे पकडूँ मैं,
मन पल में भग जाए कहीं पर
मन को कैसे जकडूँ मैं,

मन मारूँ ना मन की मानूँ
मन को मैंने समझ लिया,
मन से प्रीत लगाली मैंने
मीत बना कर जकड़ लिया,

मन को जीता जग को जीता
मन ख़ुशियों से लहराया,
जग जाहिर करता मैं ख़ुशियाँ
घर पे तिरंगा फहराया...

ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें



ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें

सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें

याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें

टिप्पणी
इस गज़ल को शहरयार ने फ़िल्म "उमराव जान" के लिये लिखा था। फ़िल्म में नायिका उमराव जान एक शायरा भी हैं और उनका तख़ल्लुस "अदा" है।

Saturday, February 25, 2012

ईमानदारी और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य कविता:


भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर........

करोड़पति के सेट पर, हो गया आज बवाल ।


करोड़पति के सेट पर, हो गया आज बवाल ।
कंप्यूटर स्क्रीन पर, आया गज़ब सवाल ॥
आया गज़ब सवाल जीतकर,फास्टेस्ट फिंगर फस्ट ।
हॉट सीट पर आ गए, नेता जी एक भ्रस्ट ॥
पहला प्रश्न जिताएगा, रुपये पाँच हजार ।
देश में भ्रस्टाचार का , कौन है जिम्मेदार ? ॥
सही जवाब बतलाइए , ऑप्शन ये रहे चार ।
ए) जनता बी) मंत्री सी) नेता डी) सरकार ॥
हम ही नेता, हम ही मंत्री, हमरी ही सरकार ।
जो जनता को लौक किया, चुनाव जाएँगे हार ॥
मंत्री जी पड़ गए सोच में, मदद करे अब कौन।
बोले -अपने अध्यक्ष को लगाया जाये फोन ॥
तीस सेकंड में हो गई, नोट वोट की डील ।
कुइट किया नेता जी बोले एक्चुली व्हाट आई फील ॥
बिना जवाब के अरबों बनते अपनी वोट - सीट पर।
क्या रखा है "राघव " छोड़ो ऐसी हॉट-सीट पर ॥
झूठे वादे, झूठी क़समें, झूठे दिखा कर सपने ।
वहाँ जनता के वोटिंग पेड्स पर सारे ऑप्शन अपने ॥
कभी कभी बस भाषण बाज़ी, करके तेवर तीखे ।
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥

Tuesday, February 21, 2012

सच्चा प्रयास कभी निष्फल नहीं होता



1) आपके पास किसी की निन्दा करने वाला, किसी के पास तुम्हारी निन्दा करने वाला होगा।
2) कष्ट सहन करने का अभ्यास जीवन की सफलता का परम सुत्र है।
3) जिसके पास उम्मीद हैं, वह लाख बार हारकर भी नहीं हारता।
4) गलती कर देना मामूली बात है, पर उसे स्वीकार कर लेना बड़ी बात है।
5) शर्म की अमीरी से इज्जत की गरीबी अच्छी है।
6) सच्चा प्रयास कभी निष्फल नहीं होता।
7) स्वयं को स्वार्थ, संकोच और अंधविश्वास के डिब्बे से बाहर निकालिए, आपके लिए ज्ञान और विकास के नित-नवीन द्वार खुलते जाएँगे।
8) सुख और आनन्द ऐसे इत्र हैं… जिन्हें जितना अधिक दूसरों पर छिड़केंगे, उतनी ही सुगन्ध आपके भीतर समायेगी।
9) जीवन संध्या तरफ जाते हुए डरना मत, मृत्यु तो दिन के बाद रात का आराम है।
10) छोटा सा समाधान बड़ी लड़ाई समाप्त कर देता हैं, पर छोटी सी गलत फहमी बड़ी लड़ाई पैदा कर देती हैं। मन में घर कर चुकी गलतफहमियों को निकालें और समाधान का हिस्सा बनें।
11) संगीत की सरगम हैं माँ, प्रभु का पूजन हैं माँ, रहना सदा सेवा में माँ के, क्योंकि प्रभु का दर्शन हैं माँ ।
12) नाशवान में मोह होता हैं, अविनाशी में प्रेम होता हैं।
13) लेने की इच्छा वाला साधक नहीं हो सकता है।
14) अपने सुख को रेती में मिला दे तो खेती हो जायेगी।
15) ममता रखने से वस्तुओं का सदुपयोग नहीं हो सकता है।
16) केवल ‘तू’ और ‘तेरा’ हैं, ‘मैं’ और ‘मेरा’ हैं ही नहीं।
17) अभिमान अविवेकी को होता हैं, विवेकी को नहीं।
18) वस्तुएँ काम में लेने के लिए हैं, ममता करने के लिए नही।
19) मनुष्य योनि साधन योनि है।
20) कर्मयोग है-संसार में रहने की बढि़या रीति।
21) जो हमसे कुछ चाहे नहीं, और सेवा करे, वह व्यक्ति सबको अच्छा लगता है।
22) हमारा शरीर पंचकोशो से बना हुआ है-
1. अन्नमय कोश अर्थात् यह स्थूल शरीर,
2. प्राणमय कोश अर्थात् क्रियाशक्ति,
3. मनोमय कोश अर्थात् इच्छा शक्ति,
4. विज्ञानमय कोश अर्थात् विचारशक्ति और
5. आनन्दमय कोश अर्थात् व्यक्तित्व की अनुभूति।
23) अशान्ति की गन्ध किसमें नहीं होती ? जो होने में तो प्रसन्न रहता हैं, किंतु करने में सावधान रहता है।
24) प्रेम करने का कोई तरीका नहीं हैं पर प्रेम करना सबको आता है।

Monday, February 20, 2012

शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।


रक्त से लिखा गया हैं, विजय का इतिहास जो।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

रक्त की हर बूंद , जन-जन के ह्रदय में लिख गयी।
राष्ट्र-श्रद्धा, आपके हाथों सहज ही बिक गयी।।
बल दिया बलिदान ने, इस राष्ट्र के विश्वास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

राष्ट्र की रग-रग फड़कती, आपके बलिदान से।
राष्ट्र प्यारा हो गया हैं, हम सभी को प्राण से।।
राष्ट्र पर हम भी करेंगे समर्पित हर साँस को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आपकी गाथा सुनाई जायेगी , संतान को।
और माताएँ भरेंगी सुतों में स्वाभिमान को।।
छू लिया हैं आपने बलिदान के आकाश को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आपका परिवार अब राष्ट्रीय धरोहर हो गया।
त्याग उसका, राष्ट्र के सम्मुख उजागर हो गया।।
राष्ट्र मुरझाने न देगा, आपके मधुमास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आओ ! सब मिल, “शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।
राष्ट्र के रक्षार्थ, सब कुछ मिटाने का व्रत धरें।।
ताकि जीवित रख सकें, उत्सर्ग के इतिहास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …


छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी
नये दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …

आज पुरानी ज़ंजीरों को तोड़ चुके हैं
क्या देखें उस मंजिल को जो छोड़ चुके हैं
चाँद के दर पे जा पहुंचा है आज ज़माना
नये जगत से हम भी नाता जोड़ चुके हैं
नया खून है, नयी उमंगें, अब है नयी जवानी
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …

हमको कितने ताजमहल हैं और बनाने
कितने हैं अजंता हम को और सजाने
अभी पलटना है रुख कितने दरियाओं का
कितने पवर्त राहों से हैं आज हटाने
नया खून है, नयी उमंगें, अब है नयी जवानी
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …

आओ मेहनत को अपना ईमान बनाएं
अपने हाथों को अपना भगवान बनाएं
राम की इस धरती को गौतम की भूमी को
सपनों से भी प्यारा हिंदुस्तान बनाएं
नया खून है, नयी उमंगें, अब है नयी जवानी
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …

हर ज़र्रा है मोती आँख उठाकर देखो
माटी में सोना है हाथ बढ़ाकर देखो
सोने की ये गंगा है चांदी की यमुना
चाहो तो पत्थर पे धान उगाकर देखो
नया खून है, नयी उमंगें, अब है नयी जवानी
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी …

रचनाकार: प्रेम धवन

शिव तांडव स्तोत्रम्





Saturday, February 18, 2012

झाँसी वाली रानी थी.....


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

Friday, February 17, 2012

बहुत सो चुकी अब तो जागो


बहुत सो चुकी अब तो जागो, ओ नारी कल्याणी ।
परिवर्तन के स्वर में भर दो, निज गौरव की वाणी॥

बन कौशल्या आज देश को, फिर से राम महान् दो ।
और सुनैना बनकर फिर से, सीता-सी संतान दो॥
वीर जननि हो तुम संतानें, अर्जुन भीम समान दो ।
भारत माता माँग रही है, वापस उसकी शान दो॥
केवल तुम ही बन सकती हो ,नूतन युग निर्माणी ।
बहुत सो चुकी अब तो…………………….

भारत भ्रमित जितने तुलसी हैं, सबको दो ललकार ।
रतनावली तुम्हारा गौरव, तुमको रहा पुकार॥
कालिदास सम सोयी प्रतिभा ,सकतीं तुम्हीं निखार ।
महानता की देवी तुमको, जगती रही निहार॥
बनो प्रेरणा, राह देखता, जग का प्राणी-प्राणी ।
बहुत सो चुकी अब तो……………………..

जीजाबाई बनो देश को, वीर शिवा की है फिर चाह ।
सिवा तुम्हारे कौन बताये , बलिदानी वीरों को राह॥
जागो अब तो मत होने दो, तुम मानवता को गुमराह ।
वह जौहर दिखलाओ जग के, मुख से बरबस निकले वाह॥
नयी सदी की नींव तुम्हीं को है अब तो रखवानी॥
बहुत सो चुकी अब तो……………………………

बनो अहिल्याबाई अपनी, आत्म शक्ति फिर दिखलाओ ।
लक्ष्मीबाई बन अनीति का, गर्व चूर कर बतलाओ॥
दुर्गावती बनो शासन की, डोर थामने आ जाओ ।
सावित्री बन सत्यवान को, यम से पुनःछुड़ा लाओ॥
रच दो अपनी गौरव गरिमा, की फिर नई कहानी ।
बहुत सो चुकी अब तो……………………….

देश महान् है


इतने रतन दिये हैं कैसे , जिससे देश महान् है ।
भारत की परिवार व्यवस्था, ही रतनों की खान है ।

इसी खान के रतनों के, इतिहास चाव से पढ़े गये ।
अध्यायों की अँगूठियों में, यही नगीने जड़े गये॥
सजे हुए हैं यही रतन तो , जन मंगल के थाल में ।
दमक रहे हैं ये हीरे ही, मानवता के भाल में
इसी खान के रतनों की तो, सदा निराली शान है॥

इसी खान में ध्रुव निकले थे, माँ ने उन्हें संवारा था ।
इस हीरे को नारद जी ने, थोड़ा और निख्रारा था
तप की चमक लिये जा बैठा, परम पिता की गोद में ।
कितनों का बचपन कट जाता, है आमोद प्रमोद में॥
नभ में ध्रुव परिवार कीर्ति का शाश्वत अमर निशान है॥

जाना था बनवास राम को, लक्ष्मण सीता साथ गये ।
कीर्तिमान स्थापित सेवा, स्नेह त्याग के किये नये॥
सौतेली माँ का मुख उज्ज्वल, किया सुमित्रा माता ने ।
था सोहार्द सगे भाई से, ज्यादा भ्राता भ्राता में॥
वह संस्कारित परिवारों का, ही अनुपम अनुदान है॥

ऐसे ही परिवार चाहिए, फिर से नव निर्माण को ।
जहाँ देव संस्कार मिले, धरती के इन्सान को॥
राम-भरत का स्नेह चाहिए, घर-घर कलह मिटाने को ।
दशरथ जैसा त्याग चाहिए, राष्ट्र धर्म अपनाने को॥
हो परिवार जहाँ नन्दनवन, वह भू, स्वर्ग समान है॥

Thursday, February 16, 2012

माँ की शिक्षा


माँ कहा-बच्चे ? अब तुम समझदार हो गए हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस पौधे में जल भी चढ़ाया करो। तुलसी उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।“

बच्चे ने तर्क किया-माँ ? तुम कितनी भोली हो, इतना भी नहीं जानतीं कि यह तो पेड़ है। पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं ? इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?

लाभ है मुन्ने ? श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अंत में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।


तब से विनोबा भावे जी (बच्चे) ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना शुरू कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, इसका प्रमाण अब सबके सामने है।

MAHATMA GANDHI

Wednesday, February 8, 2012

14 फरवरी वेलनटाइन डे





वेलनटाइन डे ...""मेरी अपनी कोई बहन नही है पर जिनकी है वो जवाद जरूर देना""एक तरफ तो युवक 14 फरवरी को हाथ में 2-4 रूपये का फूल 50 रूपये में खरीद कर लड़की को देने को सही ठहराता है और इसे आजा़दी कहता है और दूसरी तरफ जब उसी आज़ादी की बात उसकी सगी बहन करे तो लड़की और उसके साथी को पीटने पर उतारू हो जाता है क्यों ?... ... जो काम किसी की बहन के साथ करना चाहते हो वो अगर तुम्हारी बहन करे तो आज़ादी को कैसा खतरा ?क्या सब अधिकार लड़को के हैं या सच जानते हुए भी अनजान बनने का नाटक करते हो ? क्या यही है हमारी पढ़ाई और हमारा माडरन होना ?क्या आप लोग इस बात से सहमत हैं ?....जिनके अपने घर शीशे के होते है वो दूसरों के घरो में पत्थर नहीं फेंकते..लोग अपने परिवार के सदस्यों को शामिल नहीं करना चाहते..लेकिन वही काम दूसरो के साथ कैसे कर सकते है....बहुत ही शर्मशार कर देनेवाला तजुर्बा है यह तो...'प्रेम' जैसे पवित्र रिश्ते को इस तरह से सरेआम लोग अपने कदमो तले कुचल रहे है.....हम सबको इस पाश्चात्य प्रेम दिवस का विरोध करना चाहिए..

DIL ME AAG JALNI CHAHIYE



Ho gayi peer parbat si pighalani chahiye,



Is himalay se koi Gangaa nikalani chaahiye
Aaj ye deewar pardo ki tarah hilane lagi,



Shart lekin thi ki buniyaad hilani chahiye
Sirf hungama khada karna mera maksad nahi,



Meri koshish hai ki ye surat badalani chahiye
Mere seene me nahi to tere seene me sahi,



Ho kahi bhi aag magar aag jalni chahiye
RELETED POST;ANNA HAJARE