Friday, September 21, 2012

©રચના -લડીએ છીએ!! -જીગ્નેશ એન પંડયા (દેશપ્રેમી)


અમો સમયની વિરુદ્ધ દિશાની વિમુખ લડીએ છીએ,
પરિવાર સાથે પણ પરિસ્થિતિ વિરુદ્ધ લડીએ છીએ,

સંજોગો વિપરીત હોય ભલે તો પણ લડીએ છીએ,
પરિણામ હોય ભલે વિરુદ્ધ તોય અમે લડીએ છીએ,

મોતની સામે જીવન માટે દરરોજ અમે લડીએ છીએ,
પ્રભુ હોય સાથ આપનો તો દુનિયા સામે લડીએ છીએ,


અંતિમ શ્વાસ સુધી હાર સામે જીતવા અમો લડીએ છીએ,
ફળની ચિંતા કોને છે?,અમે મહેનત કરીને લડીએ છીએ,

તોફાનો સામે અમો મધ-દરિયે જઈ રોજ લડીએ છીએ,
મોતનાં ખેલ આદત થઇ હવે અમે તોય લડીએ છીએ,
 
©રચના -લડીએ છીએ!! -જીગ્નેશ એન પંડયા (દેશપ્રેમી)

Tuesday, September 18, 2012

વ્યથા મારા દિલની....

વ્યથા મારા દિલની કોને કહું? હસે છે ચહેરો ને રડે છે મન,
સમજી શકે મારા દિલની વ્યથાને એ હૃદયને કહું મારું દર્દ.
©રચના -જીગ્નેશ એન પંડયા (દેશપ્રેમી)

Friday, September 14, 2012

क्योंकि मैं आम आदमी हूँ....हाँ...हाँ.. मैं आम आदमी हूँ ...

क्योंकि मैं आम आदमी हूँ....हाँ...हाँ.. मैं आम आदमी हूँ ...

तुम देश और जनता का पैसा लूटो .... राष्ट्र-विरोधी ताकतों से तुम्हारी साँठ-गाँठ हो..... तुम ईश्वर और संविधान की शपथ लो और ऐसे घृणित कार्य सीना ठोक कर करो जिस की कल्पना मात्र से शायद ईश्वर भी घबराता होगा और संविधान निर्माताओं की सोच भी वहाँ तक नहीं पहुँची होगी .....फ़िर भी तुम भारत-रत्न के अधिकारी हो.....तुम राष्ट्र की सुरक्षा के लिए बने उप

करणों की खरीद-फ़रोख्त में दलाली खाओ... फ़िर भी तुम नमन के हकदार हो ... तुमने तो ताबुतों पर भी मलाई खाई....शायद तुम्हारा हक होगा ??...अपनी काली और स्याह करतूतों को गाँधी की खादी से ढ़ंको ... तुमने जनतंत्र के मंदिर पर अपना कब्जा जो जमा रखा है इसलिए तुम्हारे हजारों-लाखों खून माफ़ हैं... मैं अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करूँ तो मैं राष्ट्र-द्रोही... क्योंकि मैं आम आदमी हाँ..हाँ... मैं आम आदमी हूँ...

अभी तुमने देश में सेंसरशिप और आपातकाल की घोषणा नहीं की है..... लेकिन यह अघोषित आपातकाल है , संक्रमणकाल है जो और भी दुखद है, और भी खतरनाक है ... अजीब विडम्बना है तुम इस देश में नफरत भड़काने वाले भाषण से तो बच सकते हो..... दंगों और धार्मिक उन्माद की पटकथा तुम लिखते हो....लेकिन राजनीतिक व्यंग्य के बाद मैं तुरंत गिरफ्तार किया जाता हूँ क्योंकि मैं आम आदमी हूँ....हाँ...हाँ.. मैं आम आदमी हूँ ...

तुम राष्ट्र-गौरव के प्रतीक लाल किले की प्राचीर पर राष्ट्र-ध्वज के साये में हम से झूठे वादे करो...क्योंकि यही तुम्हारा राष्ट्र-प्रेम है.... मैं भूख की जद्दो-जहद से जूझता रहूँ लेकिन मौन रहूँ .....तुम मेरे पैसे के उजाले से रौशन रहो....मैं गुमनामी के साये में अपने वजूद को ढ़ूँढ़ता रहूँ...क्योंकि मैं आम आदमी हूँ....हाँ...हाँ.. मैं आम आदमी हूँ ....

मैं कुछ ना देखूँ , कुछ ना सुनूँ और कुछ ना बोलूँ... क्योंकि मैं गाँधी जी के बन्दर का "नया संस्करण हूँ "...मैं तुम्हारे ईशारे पर दुम हिलाऊँ और भौंकूँ क्योंकि मैं तुम्हारे तंत्र का कुत्ता हूँ...मच्छरों की भाँति मरना मेरी नीयति है और बुलेट-प्रूफ़ जैकेट तुम्हारा अधिकार है..... तो मैं कहाँ जाऊँ....?? कहाँ रोऊँ ?? कहाँ चिल्लाऊँ ?? कहाँ से अपने राष्ट्र- प्रेम का सर्टिफ़िकेट (प्रमाण-पत्र ) लाऊँ..?? क्योंकि मैं आम आदमी हूँ....हाँ...हाँ.. मैं आम आदमी हूँ ...
BY:EK ANJAN AAMAADAMI KI VYATHA